ईरानी मुद्रा में भारी गिरावट से भारतीय बासमती निर्यात पर संकट, ₹2000 करोड़ के ऑर्डर अधर में
ईरान की मुद्रा रियाल के अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचने के बाद भारतीय बासमती चावल के निर्यात पर गहरा असर पड़ा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि ईरानी सरकार ने भारतीय बासमती पर दी जाने वाली सब्सिडी बंद कर दी है, जिसके चलते निर्यातकों ने नई खेप भेजना फिलहाल रोक दिया है। अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों पर करीब ₹2000 करोड़ मूल्य की बासमती चावल की खेप क्लीयरेंस के इंतजार में फंसी हुई है, जिससे पंजाब और हरियाणा के राइस मिलर्स और व्यापारियों की चिंता बढ़ गई है।
ईरान, सऊदी अरब के बाद भारतीय बासमती का दूसरा सबसे बड़ा आयातक देश है। यहां सालाना करीब 12 लाख टन सेला (पारबॉयल्ड) बासमती चावल आयात किया जाता है, जिसकी अनुमानित कीमत लगभग ₹12,000 करोड़ है। पंजाब और हरियाणा में उगाई जाने वाली 1509 और 1718 किस्में अपने लंबे दाने और खुशबू के कारण ईरानी बाजार में खास पसंद की जाती हैं। मौजूदा हालात के चलते इन किस्मों की कीमतों में ₹4 प्रति किलो तक की गिरावट दर्ज की गई है।
ईरान-इजरायल तनाव से पहले जहां एक डॉलर की कीमत लगभग 90,000 रियाल थी, वहीं अब यह गिरकर करीब 1,50,000 रियाल प्रति डॉलर हो गई है। इससे ईरान के लिए आयात बेहद महंगा हो गया है। पहले ईरानी सरकार खाद्य आयात पर 28,500 रियाल प्रति डॉलर की रियायती दर देती थी, लेकिन अब यह सुविधा भी समाप्त कर दी गई है।
वित्त वर्ष 2023-24 में भारत से कुल 59.42 लाख मीट्रिक टन बासमती चावल का निर्यात हुआ था। इसमें से 7 लाख टन ईरान, 11 लाख टन सऊदी अरब, 8 लाख टन इराक, 3 लाख टन यमन और 3 लाख टन अमेरिका भेजा गया था। आमतौर पर ईरान हर साल जून में अपने घरेलू उत्पादन के कारण आयात बंद कर देता है और सितंबर से दोबारा आयात शुरू करता है। इसी दौरान भारतीय निर्यातक राइस मिलर्स से स्टॉक जुटाते हैं, लेकिन इस बार यह चक्र पूरी तरह बिगड़ गया है।
इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी The New Indian Express की रिपोर्ट में सामने आई है, जिसमें बताया गया है कि मौजूदा संकट का सबसे ज्यादा असर देश के सबसे बड़े बासमती उत्पादक राज्य पंजाब पर पड़ेगा, जहां कुल उत्पादन का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा आता है। इसके बाद हरियाणा और अन्य राज्यों का नंबर आता है।
ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सतीश गोयल ने कहा, “हम हर साल करीब 10 लाख टन बासमती ईरान को निर्यात करते हैं, जो भारत के कुल वैश्विक निर्यात का लगभग 15 से 16 प्रतिशत है। लेकिन अमेरिका-ईरान तनाव और वहां चल रहे विरोध प्रदर्शनों के चलते ईरानी मुद्रा में भारी गिरावट आई है। इससे सरकार ने दशकों से दी जा रही सब्सिडी बंद कर दी है, जिससे निर्यातकों का भरोसा डगमगा गया है।”
उन्होंने आगे कहा, “फिलहाल हम ‘वेट एंड वॉच’ की नीति अपना रहे हैं। हालात साफ होने तक कोई फैसला लेना मुश्किल है। वहां आयातकों से संपर्क करना भी कठिन हो गया है।”
एक अन्य निर्यातक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पहले भारत और ईरान के बीच बार्टर ट्रेड होता था, जो भारत द्वारा ईरान से तेल आयात बंद करने के बाद खत्म हो गया। इसके बावजूद ईरान भारत से चाय, बासमती और दवाइयां आयात करता रहा, लेकिन अब इन आयातों पर भी ब्रेक लगता दिख रहा है।
उनका कहना है कि मौजूदा हालात में करीब ₹2000 करोड़ के ऑर्डर अधर में लटक गए हैं और कोई नहीं जानता कि आने वाले दिनों में स्थिति किस दिशा में जाएगी।
APEDA के मुताबिक, वर्ष 2022 में बासमती निर्यात से भारत को करीब ₹48,000 करोड़ का विदेशी मुद्रा लाभ हुआ था, जिसमें अकेले पंजाब का योगदान लगभग 40 प्रतिशत रहा।
ईरान में आर्थिक संकट को लेकर शुरू हुए विरोध प्रदर्शन अब देशव्यापी आंदोलन का रूप ले चुके हैं। तेहरान समेत कई शहरों में बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक यह पिछले कई वर्षों में सरकार के खिलाफ सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन है, जो लगातार दूसरे सप्ताह भी जारी है।
